जनमत हिन्दी। राजभाषा विभाग, जबलपुर मंडल के मार्गदर्शन में राजभाषा कार्यान्वयन समिति कटनी जंक्शन द्वारा महान साहित्यकार एवं गजलकार बशीर बद्र की स्मृति में काव्य एवं गजल गोष्ठी का आयोजन स्टेशन प्रबंधक कार्यालय, कटनी में किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता स्टेशन प्रबंधक संजय दुबे ने की, जबकि संचालन मुख्य टिकट निरीक्षक प्रमोद भट्ट ‘नीलांचल’ ने किया। मंडल राजभाषा विभाग के वरिष्ठ अनुवादक किशोर कुमार साहू ने कार्यक्रम का संचालन किया।कार्यक्रम का शुभारंभ सरस्वती वंदना से हुआ। अध्यक्ष संजय दुबे ने बशीर बद्र के चित्र पर माल्यार्पण किया और उपस्थित लोगों ने श्रद्धा सुमन अर्पित किए। इसके बाद आमंत्रित कवियों एवं गजलकारों को शॉल, सम्मान पत्र और पुस्तक भेंट कर सम्मानित किया गया।अपने उद्बोधन में संजय दुबे ने बशीर बद्र के जीवन, उपलब्धियों तथा हिंदी और उर्दू साहित्य में उनके योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने सभी को राजभाषा हिंदी में कार्य करने के लिए प्रेरित किया।कार्यक्रम के आयोजक किशोर कुमार साहू ने राजभाषा नीति एवं नियमों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से साहित्य के लिए समर्पित महान साहित्यकारों को याद कर श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है। ऐसे आयोजन राजभाषा के प्रति माहौल बनाने में सहायक होते हैं। नवीन कुमार ने बशीर बद्र के जीवन परिचय, व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए हिंदी में कार्यालयीन कार्य के लिए प्रेरित किया।गोष्ठी में कवि एवं गजलकार सतीश आनंद ने बशीर बद्र द्वारा बनाई गई अदबी राह का उल्लेख करते हुए वर्तमान समय में मानवीय मूल्यों के क्षय पर ध्यान दिलाया। उन्होंने पढ़ा—“कितनी कच्ची हो चली अब रिश्तों की डोर, संबंधों ने छल किया मन के भीतर चोर।”शायर और गीतकार चन्द्र किशोर श्रीवास्तव ‘चंदन’ ने सरस्वती वंदना के बाद गजल प्रस्तुत की—“ना सही आज लिखूंगा कल देखना, सिर्फ़ उनके लिए एक ग़ज़ल देखना।”राजेश प्रखर ने बशीर बद्र को खिराजे अकीदत पेश करते हुए गजल की बानगी प्रस्तुत की—“जिंदा अगर हो सच में जिंदा सबूत रखना, हर बात का यहां पर पुख़्ता सबूत रखना।”मकसूद खान नियाज़ी ने बशीर बद्र के संस्मरण सुनाते हुए उन्हें सलाम पेश किया—“किसी से दिल नहीं मिलता, कोई दिल से नहीं मिलता, किसे अपना कहें दिल के कोई काबिल नहीं मिलता।”प्रमोद भट्ट ‘नीलांचल’ ने कहा कि बशीर बद्र ने अंधेरों के समंदर से सितारे चुनना इस सदी को सिखाया और डिप्रेशन व नकारात्मक मनोदशा के बीच उर्दू काव्य के आकाश में रोशनी के रक्स का एहतिमाम किया। उन्होंने गजल प्रस्तुत की—“लिली के फूलों की रंगत हसीन लगती है, भले ही सूनी हो ये छत हसीन लगती है।”जितेंद्र पटवा ‘नीरस’ ने बशीर बद्र के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए तरन्नुम में गजल प्रस्तुत की—“दिल के पन्ने को जवानी में न कोरा छोड़ो, इश्क करना है मुकम्मल तो अधूरा छोड़ो।”शेख समीर ने बशीर बद्र की गजल प्रस्तुत करते हुए उनके दृष्टिकोण को स्पष्ट किया। राजभाषा विभाग के किशोर कुमार साहू ने हिंदी और अंग्रेजी भाषा के मानवीय रूपकों के माध्यम से रचना प्रस्तुत की। सभी कवियों एवं गजलकारों ने अपनी प्रतिनिधि रचनाओं का वाचन किया। प्रस्तुतियों पर करतल ध्वनि से हॉल गूंजता रहा।कार्यक्रम में चंद्रेश जी, महंती कुशराम जी, मुख्य टिकट निरीक्षक धीरेन्द्र दहिया, विनय भार्गव जी, यशपाल, बाबूलाल जाटव, रोहणी गंगबे जी, आराधना बहुगुणा जी, टीटीई स्वदेश त्यागी, TCM शाहबाज खान, सुरेन्द्र मीणा जी, SR Tech रोहित नेपाली जी, सम्पत वर्मा जी, ASST सुब्रत गिरि जी, नीतेश यादव जी, DCTI राकेश कुमार, मोहित कुमार, Tech अनिरुद्ध मौर्य, देवेंद्र पचौरी, आलोक भाले और रस्म जी ने कार्यक्रम के संयोजन में सहभागिता की।कार्यक्रम के अंत में वरिष्ठ अनुवादक किशोर कुमार साहू ने आभार प्रदर्शन किया और समापन की घोषणा की।
डॉ बशीर बद्र की याद में सजी महफिल: कटनी स्टेशन में काव्य और गजल गोष्ठी का आयोजन, रिश्तों की डोर से इश्क के एहसास तक, कवियों ने छेड़े जज्बात के तार


































































































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